आने वाले संसदीय चुनाव में एसयूसीआई (कम्युनिस्ट) 20 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में 119 सीटों पर चुनाव लड़ेगी

(13 मार्च 2019 को एसयूसीआई (कम्युनिस्ट) के 48-लेनिन सरणी, कोलकाता में स्थित केंद्रीय कार्यालय में बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में एसयूसीआई (कम्युनिस्ट) के महासचिव प्रभास घोष द्वारा संसदीय क्षेत्र के चुनाव के लिए वितरित किया गया प्रेस हैंडआउट)
17वीं लोकसभा गठित करने के चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी गई है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों बुर्जुआ पार्टियाँ, इस घोषणा से पहले महीनों से मतदाताओं को लुभाने के लिए चुनाव-पूर्व ढेर सारे वादों की बौछार करने में व्यस्त हैं। साथ ही वे एक-दूसरे पर कीचड़-उछालने में लगी हुई हैं।
17वीं, 18वीं और 19वीं सदी में अपने आगमनकाल में, उभरते हुए पूँजीवाद ने निरंकुश सामंती-राजतंत्रीय व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के द्वारा, वैज्ञानिक सोच, लोकतंत्र, लोकतांत्रिक मूल्यों, धर्म से मुक्त धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद की अवधारणा, समानता-स्वतंत्रता के उदात्त आदर्शों को बुलंद किया था और बुर्जुआ लोकतांत्रिक क्रांति संपन्न की थी। उस समय, पूँजीवाद की राजनीतिक प्रणाली के रूप में बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र की स्थापना हुई थी। राज्य के तीनों अंगों — विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों की सापेक्ष स्वायत्तता और अलग-अलग शक्तियां निर्धारित की गई थी। उदीयमान पूँजीवाद के शुरुआती दिनों में, उभरते हुए प्रगतिशील बुर्जुआ वर्ग ने इन सभी सिद्धांतों को काफी हद तक अपनाया था। लेकिन एक बार इतिहास के अटल नियम का अनुसरण करते हुए पूँजीवाद एकाधिकारी पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के स्तर में प्रवेश कर जाने के बाद, इसका पतनशील और प्रतिक्रियावादी चरित्र सुस्पष्ट रूप से प्रकट हुआ। जाहिर है, सभी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी देशों में पूँजीवादी शासकों ने उन सभी लोकतांत्रिक अधिकारों, मूल्यों, रीति-रिवाजों और आचार संहिताओं को रौंदना शुरू कर दिया है, जिनके वे कभी चैंपियन थे। लोकतांत्रिक अधिकार की अवधारणा को ही अब कच्चे माल के रूप में लोगों को बेरहमी से लूटने के एकाधिकारी पूँजीपतियों का निरंकुश अधिकार बना दिया गया है। लोकतंत्र के नारे — ‘‘लोगों का, लोगों के द्वारा और लोगों के लिए शासन’’ को घोर दमनकारी प्रणाली के संचालन के जरिये बदल कर ‘‘एकाधिकारी पूँजीपतियों का, एकाधिकारी पूँजीपतियों द्वारा और एकाधिकारवादियों के लिए’’ कर दिया गया। तर्कशील सोच की प्रक्रिया को कुंद करने के लिए धर्मांधता के साथ समझौता करने और धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने का सहारा लिया गया। प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, दार्शनिक सहिष्णुता और इस तरह की अन्य सभी पूर्ववर्ती लोकतांत्रिक अवधारणाओं की जब चाहे मनमाने ढंग से धज्जियाँ उड़ाई जाने लगीं। विरोध की आवाज का मुँह बंद कर दिया जा रहा है और सभी वैध विरोधों को बेरहमी से दबाया जा रहा है। साथ ही, संसदीय लोकतंत्र को संसदीय फासीवादी निरंकुशता में बदल दिया जा रहा है। लोकतंत्र को विभिन्न देशों में अलग-अलग रूपों और आयामों में फासीवाद द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है। बहुदलीय लोकतंत्रवस्तुतः द्विदलीय लोकतंत्रबन गया है।
पूँजीवादी-साम्राज्यवादी देश के रूप में भारत इसका कोई अपवाद नहीं रहा है। यह भी सड़े-गले प्रतिक्रियावादी पूँजीवाद की इन सभी बुराइयों से दागदार है। चुनावी मोर्चे पर क्या हो रहा है? सत्तारूढ़ पूँजीपति वर्ग अपने राजनीतिक प्रबंधक के रूप में अपनी भरोसेलायक इस या उस पार्टी का चयन कर रहा है और फिर इसे धनबल, बाहुबल, मीडियाबल और प्रशासनिक शक्ति का उपयोग करके सत्ता में लाता है। जब सत्ताधारी पार्टी उसकी जनविरोधी पूँजीपतिपरस्त नीतियों के कारण लोगों के सामने बदनाम हो जाती है और उसके खिलाफ जन आक्रोश और शिकवे-शिकायतें जमा होने लगती हैं, तो सत्ताधारी पूँजीपति अपने किसी दूसरे चुने हुए राजनीतिक प्रबंधक को सामने लाता है और पहले वाले प्रबंधक को हटाकर दूसरे किसी प्रबंधक को गद्दी पर बिठाता है। अतः, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल पूंजीपतियों के एक जर खरीद नौकर से ज्यादा कुछ नहीं हैं। समय-समय पर सरकारों की अदला-बदली और रस्म अदायगी के तौर पर चुनाव कराने के इस खेल का नतीजा क्या रहा? अमीर और भी अमीर होता जा रहा है और गरीब और भी गरीब। कुल 1% धनासेठ देश की 73% संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं। भारत एक तिहाई वैश्विक गरीबों का घर बन गया है। यहाँ 20 करोड़ 30 लाख लोग रोजाना भूखे रहते हैं। न्यूनतम स्वास्थ्य देखभाल और उपचार के अभाव में 4000 से अधिक लोग प्रतिदिन मरते हैं। कारखानाबंदीतालाबंदी, कामगारों की छंटनी लगातार बढ़ती जा रही है। स्थायी या पक्की नौकरियों की जगह अस्थायी या कच्ची यानी अनुबंध या ठेके की नौकरियों ने ले ली है। एकाधिकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ मध्यम और छोटे व्यापारियों को मार रही हैं। बेरोजगारी विकराल रूप लेती जा रही है। 70 करोड़ से अधिक लोग बेरोजगार और अर्ध-बेरोजगार हैं, यूपी में चपरासी के 368 पदों के लिए अच्छी संख्या में पोस्ट ग्रेजुएट और डॉक्टरेट डिग्रीधारियों सहित 23 लाख से अधिक आवेदन प्राप्त होना इसकी साफ गवाही देता है। रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षाओं और विभिन्न राज्यों में नौकरियों के लिए आये आवेदनों में भी बेरोजगारी का यही दिल दहला देने वाला आलम देखने को मिल रहा है। उत्पादित फसलों का लाभकारी मूल्य पाने में असमर्थ गरीब किसान आत्महत्या कर रहे हैं। अब तक 3 लाख 50 हजार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। काला धन बरामद करने के नाम पर जो किया गया है वह काला धन और भी तेजी से बढ़ाने वाला है। लोक दिखावे के लिए केवल कुछ छोटे अपराधियों को हिरासत में लिया जाता है, जबकि बड़े-बड़े मगरमच्छ यानी बड़े-बड़े धनकुबेर अदण्डित रहते हुए शासक वर्ग और इसकी ताबेदार सरकारों की सरपरस्ती में काले धन के अम्बार लगा रहे हैं। गंभीर आर्थिक हमले, राजकोषीय बर्बरता, आकाशछूती महंगाई, भिखमंगी, वेश्यावृत्ति, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तस्करी, ऑनर किलिंग, लिंचिंग, प्रवासी मजदूर, परिवारों का टूटना—सब कुछ खतरनाक रफ्तार से बढ़ रहा है। मूलभूत स्वास्थ देखभाल और शिक्षा का लगातार बढ़ते पैमाने पर आम लोगों के हाथ न आना जारी है। शोषित-पीड़ित देशवासियों की बढ़ती दुख-तकलीफों, कंगाली-बदहाली, धोखाधड़ियों और वंचनाओं की सूची अब और भी लंबी हो सकती है।
चुनाव भी आज ढकोसला और एक बहुत बड़ा धोखा हो गया है। चुनाव आयोग की आचार-संहिता और नियमों को धता बताते हुए, सत्ता-लोभी बुर्जुआ पार्टियाँ वोट हथियाने के लिए बड़ी भारी रकम खर्च करती हैं। वे धन और अन्य क्षुद्र लाभों से लोगों को लुभाने के लिए लोगों की दुर्दशा और राजनीतिक अज्ञानता का फायदा उठाती हैं। असहाय असंगठित लोग भी आसानी से उनके जाल में फंस जाते हैं, उन्हें लगता है कि जो भी थोड़ा-बहुत मिल रहा है उसे ले लेना चाहिए। चुनाव के बाद, वे पाते हैं कि उन्हें कैसे धोखा दिया गया है, बल्कि वास्तव में कुछ भी बदलाव नहीं आया है और उनका जीवन पूरी तरह से और भी बदतर हो गया है।
चुनावी मैदान में अब सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय बुर्जुआ दल केंद्र या राज्य में सत्ता-सुख चख चुके है। चूंकि भ्रष्टाचार पूँजीवाद के पतन की एक बानगी बन गया है और वस्तुतः देश में एक आम बात हो गया है, इनमें से कोई भी पक्ष इससे मुक्त नहीं है। वे कहते हैं कि उनके सांसद और विधायक जन प्रतिनिधि हैं। लेकिन पिछली लोकसभा में 545 में से 442 (यानी 82%) सांसद करोड़पति थे, सबसे अमीर के पास 683 करोड़ रुपये थे। क्या तब वे गरीब उत्पीड़ित लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे या मुट्ठी भर अमीरों का? पहले लोग राजनीतिक नेताओं का आदर करते थे। अब, कड़वे अनुभव से, वे राजनेताओं से नफरत करते हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि, जब धर्म प्रगतिशील था, तो उसने उच्च चरित्र के महापुरुषों को जन्म दिया था। लेकिन बाद में जब धर्म सामंती राजशाही के लिए अपनी सेवा में समर्पित होकर प्रतिक्रियावादी बन गया तो यह नैतिकता प्रदान करने के स्रोत के रूप में कार्य नहीं कर सका। तब लोकतांत्रिक क्रांति के समय, बुर्जुआ मानवतावाद ने अपने उदयकाल में उच्च चरित्रें को जन्म दिया। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के नेता भी उच्च नैतिक चरित्र के अधिकारी थे। लेकिन अब पूंजीवाद अपने आप में भ्रष्ट, जनविरोधी और नैतिक मूल्यों से रहित है, स्वाभाविक रूप से मौजूदा भ्रष्ट व्यवस्था के ताबेदार नेता पूरी तरह से भ्रष्ट, पाखंडी और धोखेबाज बन गए हैं। वे अब शराब की दुकानें खोलने में व्यस्त हैं, लॉटरी व्यापार का दायरा बढ़ा रहे हैं, फिल्म, टीवी और अन्य मीडिया के माध्यम से सभी प्रकार की अश्लीलता, सेक्स-विकृतियों और सड़ी-गली संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि मानव सार को नष्ट किया जा सके, लोगों को अमानवीय बनाया जा सके और उन्हें, विशेष रूप से युवाओं को भीतर से पंगू बनाया जा सके ताकि वे विरोध की आवाज न उठा सकें और इन दलों के बाहुबलियों के रूप में उन्हें खरीदा जा सके।
एक लंबे समय तक कांग्रेस ने देश पर शासन किया और समाजवादी तर्ज के समाज’, ‘गरीबी हटाओइत्यादि जैसे लुभावने नारों के साथ लोगों से मक्कारी की। जब कांग्रेस एक पर एक महाघोटोलों में संलिप्त हो जाने सहित अपनी घोर जन-विरोधी एकाधिकारी पूंजीपतिपरस्त नीतियों के कारण पूरी तरह से बदनाम हो गई तो शासक पूंजीवादी वर्ग ने संसदीय राजनीति में विकल्प के रूप में भाजपा को पेश किया और उसका समर्थन किया। भाजपा ने भी चुनाव से पहले अच्छे दिनलाने के ढेर सारे झूठे वादे किये। लेकिन इसके 5 साल के शासन में स्थिति बद से बदतर होती चली गई है। लोगों की दुर्दशा कई गुना बढ़ गई है। यह याद दिला दें कि बीजेपी के संरक्षक यानी आरएसएस ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पूरी तरह से विरोध किया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक एम एस गोलवलकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि भौगोलिक राष्ट्रवाद और आम खतरे के सिद्धांत के आधार पर हमारा जो राष्ट्रीय सिद्धांत निर्मित हुआ है, उसने व्यवहारतः हमें हमारे हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांत की प्रेरणा से वंचित कर दिया है। इसलिए, उनके अनुसार राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष प्रतिक्रियावादी था और स्वतंत्रता आंदोलनों के श्रद्धेय नेता और शहीद प्रतिक्रियावादी, देशद्रोही और गैर-देशभक्त के सिवा और कुछ नहीं थे। वास्तव में, आरएसएस ने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का पूरा सहयोग किया। अब वही आरएसएस और भाजपा, राष्ट्रवादी और देशभक्त होने का दावा कर रही हैं।
मार्क्सवादी के रूप में हम नास्तिक हैं, लेकिन हम यह भी जानते हैं कि उस काल में जब धर्म की एक प्रगतिशील भूमिका थी, सभी धर्म प्रचारक महापुरुष थे और वे सभी सामाजिक हित-उद्देश्य के लिए लड़े थे, उन्हें तत्कालीन शासकों का कोपभाजन होना पड़ा था और उन्हें उनके द्वारा सताया भी गया था। उनमें से किसी ने भी कभी किसी अन्य धर्म के खिलाफ घृणा का प्रचार नहीं किया। लेकिन अब आरएसएस-भाजपा इसके ठीक उलट काम कर रहे हैं। वे धर्म के नाम पर सांप्रदायिकता-कट्टरता को उकसा रहे हैं। क्या चैतन्य, रामकृष्ण या विवेकानंद ने बाबरी मस्जिद को गिराने या उसकी जगह राममंदिर बनाने का आह्वान किया था? क्या तुलसीदास के रामचरित मानस में बाबरी मस्जिद के बारे में ऐसा कोई संदर्भ है कि यह राम की जन्मभूमि पर बनायी गयी है? ये कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे, जिन्होंने बाबरी मस्जिद का ताला खोला था और चुनावी लाभ के लिए वहाँ रामलला की पूजा की अनुमति दी थी। इसके अलावा, हम जानते हैं कि कट्टर हिंदू सांप्रदायिक आरएसएस-भाजपा ने कैसे इसका पूरा फायदा उठाया। इनकी राह पर चलते-चलते सांप्रदायिक दंगे-फसादों का देशव्यापी प्रसार हुआ जिसने कई निर्दोष लोगों की जान ले ली, इतने सारे परिवारों को शोक संतप्त और बेघर कर दिया, कई महिलाओं की इज्जत-आबरू को लूटा गया, सांप्रदायिक तनाव और जुनून के साथ माहौल को बिगाड़ दिया गया और पूंजीवाद के तहत समान रूप से शोषित, उत्पीड़ित और दमित विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच घृणा और अविश्वास भर देने में मदद की। क्या यह तब धर्म का कोई पालन है? कौन नहीं जानता कि ये सभी चतुराई से ध्रुवीकरण के माध्यम से वोट बैंक बनाकर चुनावी लाभ लेने और उत्पीड़ित लोगों की लोकतांत्रिक एकता को नष्ट करने के लिए रची गई चाल हैं? अक्सर ये शासक धार्मिक, जातिगत, इलाकापरस्त तनावों और दंगे-फसादों को भड़काते और यह आग लगाते हैं। दलित और आदिवासी भी शोषित-उत्पीड़ित और दमित हैं।
इसके अलावादेश में फासीवादीकरण पर जोर देने के लिए वे वैज्ञानिक सोच को नष्ट कर रहे हैं और धार्मिक अंध विश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं और लोगों को यह विश्वास दिलाने में लगे हुए हैं कि जीवन ईश्वरीय आदेश द्वारा संचालित होता हैऔर पिछले जन्म में किया हुआ पापउनके सभी दुखों का कारण है और अमीर सर्वशक्तिमान ईश्वर के आशीर्वादसे अमीर होते हैं।
अब जब भाजपा अलोकप्रिय हो गई है, तो विकल्प के रूप में शासक वर्ग द्वारा कांग्रेस को वापस लाने का प्रयास है। लेकिन वे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। कांग्रेस कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, इसके नेताओं ने एक सुधारवादी किस्म के विरोधी की भूमिका निभाई, धार्मिक विचारों को बढ़ावा दिया और हिंदू धर्म का प्रमुख रूप से संरक्षण किया। इसलिए, एक सच्चे धर्मनिरपेक्ष मानवतावादी फलक पर विकसित होने की बजाय भारतीय राष्ट्रवाद वस्तुतः एक हिंदू धर्मोन्मुख राष्ट्रवाद बन कर रह गया। केवल नेताजी सुभाष, भगत सिंह, रवींद्रनाथ, शरत चंद्र, प्रेमचंद, सुब्रमण्यम भारती, नजरुल — इसके अपवाद थे। कांग्रेस ने राउरकेला, भागलपुर, नेल्ली और दिल्ली में भी दंगे करवाये। कांग्रेस अध्यक्ष बीजेपी नेताओं के साथ मंदिरों में जाने की प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और नरम हिंदुत्वका प्रचार कर रहे हैं। उसी कांग्रेस ने देश पर आपातकाल लगाया था, कई काले कानून, जैसे टाडा, मीसा, एस्मा आदि लागू किये थे, कई आंदोलनों को बेरहमी से कुचल दिया था, कई किसानों, श्रमिकों, छात्रों और युवाओं को मार डाला था। इसलिए कांग्रेस कभी भी धर्मनिरपेक्ष या लोकतांत्रिक नहीं थी। यह खेद की बात है कि उसी कांग्रेस को अब सीपीआई (एम)-सीपीआई द्वारा कुछ सांसद सीटें हासिल करने के लिए धर्मनिरपेक्षऔर लोकतांत्रिकके रूप में पेश किया जा रहा है। इससे पहले, सीपीआई (एम) ने विशुद्ध रूप से तुच्छ चुनावी स्वार्थ के लिए कांग्रेस की निरंकुशताका विरोध करने की आड़ में 1977 में आरएसएस-जनसंघ को लेकर बनी जनता पार्टी से हाथ मिलाया था। इसके बाद, सीपीआई (एम) ने वीपी सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए अभिषेक करने में भाजपा के साथ मिल गई थी और अब सीपीआई (एम) भाजपा की सांप्रदायिकता के विरोध के नाम पर कांग्रेस से मिल रही है। क्रान्तिकारी राजनीति की बात दूर रही, यहां तक कि वामपंथ का भी ऐसे घोर अवसरवाद से कोई लेना-देना नहीं है।
पहले से ही स्वतःस्फूर्त छिटपुट आंदोलन और प्रतिवादी आंदोलनों के रूप में जन असंतोष फूट पड़ रहा है। हमारी पार्टी की दृढ़ राय है कि ऐसे फूट पड़ रहे जन प्रतिवादों को संगठित रूप और उचित दिशा प्रदान करना लाजिमी फर्ज बनता है। जन जीवन की ज्वलंत समस्याओं पर वर्ग संघर्षों और जन आन्दोलनों को गठित और तीव्र करने की आवश्यकता है। इसके अलावा, विभिन्न बुर्जुआ पार्टियों की एक-दूसरे के साथ अनबन है। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पूँजियों के बीच तीव्र द्वंद्व साफ प्रकट है। यहाँ तक कि एकाधिकारी पूँजीपति घराने भी विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बंटे हुए हैं। इस तरह की अनुकूल हालात का तकाजा है बुर्जुआ सत्ता की राजनीति के विकल्प के रूप में संयुक्त शक्तिशाली वाम आंदोलन का उमड़ पड़ना। हमने उनसे एकजुट प्रयासों के साथ शक्तिशाली वर्ग संघर्ष और जन आन्दोलन विकसित करने का आग्रह किया। लेकिन उन्होंने वह उम्मीद पूरी नहीं की। बस कुछ सीटें हासिल करने के लिए सीपीआई (एम) और सीपीआई संघर्षशील वामपंथ का रास्ता छोड़ कर बेशर्मी से कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय बुर्जुआ पार्टियों की पिछलग्गू बनने में लिप्त हैं और इस तरह से वे वामपंथ को और भी कलंकित और कमजोर कर रही हैं।
हमारी पार्टी अपनी संगठनात्मक क्षमता के आधार पर विभिन्न राज्यों में लोगों की विभिन्न दबाव मांगों पर वर्ग संघर्ष और जन आन्दोलन खड़े कर रही है। बेशक इस प्रक्रिया में, चल रहे संघर्षों के एक अंग के रूप में, हम चुनाव में भाग लेंगे। हम लोगों के सामने ऐतिहासिक सच्चाई रखेंगे कि केवल सरकार बदलने से ही जीवन में दुख-तकलीफों का खात्मा नहीं होगा। इस भीषण उत्पीड़न से मुक्ति केवल पूँजीवाद-विरोधी समाजवादी क्रान्ति सम्पन्न करने से ही मिल सकती है। क्रांति की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए, सही रास्ते पर और सर्वहारा क्रांतिकारी विचारधारा और उच्च संस्कृति के आधार पर वर्ग संघर्ष और जन आन्दोलन गठित करने और तेज करने की आवश्यकता है। यदि हमारा कोई भी उम्मीदवार निर्वाचित होता है, तो वह निर्भीकता से जन हित-उद्देश्य को बुलंद करेगा और सदन के अंदर अतिरिक्त संसदीय आंदोलनों की आवाज को प्रतिबिंबित करेगा ताकि अन्दरूनी और बाहरी संसदीय संघर्षों का समन्वय-संयोजन हो सके।

 वर्ग संघर्ष और जन आंदोलन को तेज करने के लिए एसयूसीआई (कम्युनिस्ट) के उम्मीदवारों को जीतायें
लोकसभा चुनाव, 2019
संसदीय क्षेत्र की सूची और उम्मीदवारों के नाम
1- असम:
1- 1-करीमगंज: कॉमरेड प्रभाष सरकार
2- 2-सिलचर: कॉमरेड श्यामदेव कुर्मी
3- 4-धुबरी: कॉमरेड सुरतजमान मंडल
4- 6-बारपेटा: कॉमरेड हुश्नजहा बेगम (इना हुसैन)
5- 8-मंगलदोई: कॉमरेड स्वर्णलता चालिया
6- 14-लखीमपुर: कॉमरेड हेमकांता मिरी
2- आंध्र प्रदेश:
1- 35-कुरनूल: कॉमरेड एम- नागन्ना
2- 36-अनंतपुर: कॉमरेड जी- ललिता
3- अंडमान-निकोबार द्वीप समूह:
1- 1-अंडमान और निकोबार द्वीप समूह: कॉमरेड बलराम मन्ना
4- बिहार:
1- 15- मुजफ्फरपुर: कॉमरेड मोहम्मद इदरीस
2- 16- वैशाली: कॉमरेड नरेश राम
3- 21- हाजीपुर: कॉमरेड जी-एस- पासवान
4- 26- भागलपुर: कॉमरेड दीपक कुमार
5- 28- मुंगेर: कॉमरेड ज्योति कुमार
6- 30- पटना साहिब: कॉमरेड अनामिका
7- 36- जहानाबाद: कॉमरेड उमाशंकर वर्मा
8- 40- जमुई: कॉमरेड पंकज कुमार दास
5- छत्तीसगढ़ः
1- 7-दुर्ग: कॉमरेड आत्माराम साहू
2- 8-रायपुर: कॉमरेड देवेंद्र पाटिल
3- 11-कांकेर: कॉमरेड लक्ष्मी कुरेती
6- दिल्ली:
1- 1-चांदनी चौक: कॉमरेड रितु कौशिक
2- 3-पूर्वी दिल्ली: कॉमरेड मैनेजर चौरसिया
7- गुजरात:
1- 20-वडोदरा: कॉमरेड तपन दासगुप्ता
2- 25-नवसारी: बाद में घोषित किया जाएगा
8- हरियाणा:
1- 6-सोनीपत: कॉमरेड बलबीर सिंह
2- 7-रोहतक: कॉमरेड जयकरण
3- 8-भिवानी-महेंद्रगढ़: कॉमरेड ओम प्रकाश
4- 9-गुड़गांव: कॉमरेड श्रवण कुमार
9- झारखंड:
1-7-धनबाद: कॉमरेड रामलाल महतो
2- 8-रांची: कॉमरेड सिद्धेश्वर सिंह
3- 9-जमशेदपुर: कॉमरेड पनमोनी सिंह
4- 10-सिंहभूम: कॉमरेड चंद्रमोहन हेम्ब्रम
5- 14-हजारीबाग: कॉमरेड राजेश रंजन
10- कर्नाटक:
1- 5-गुलबर्ग: कॉमरेड एस- एम- शर्मा
2- 6-रायचूर: कॉमरेड के- सोमशेऽर
3- 9-बेल्लारी: कॉमरेड देवदास
4- 11-धारवाड़: कॉमरेड गंगाधर बादीगर
5- 13-दावनगेरे: कॉमरेड मधु
6- 21-मैसूर: कॉमरेड संध्या
7- 23-बैंगलोर ग्रामीण: कॉमरेड एन- रवि
8- 25-बैंगलोर सेंट्रल: समर्थित उम्मीदवार
11- केरल:
1- 2-कन्नूर: कॉमरेड आर- अपर्णा
2- 5-कोझिकोड: कॉमरेड ए- शेखर
3- 11-चालाकुडी: कॉमरेड सुजा एंटनी
4- 14-कोट्टायम: कॉमरेड ई- वी- प्रकाश
5- 15-अलप्पुझा: कॉमरेड आर- पार्थसारथी
6- 16-मवेलीकारा: कॉमरेड के- बिमलजी
7- 17-पथनमथीट्टा: कॉमरेड बिनु बेबी   
8- 18-कोल्लम: कॉमरेड ट्विंकल प्रभाकरन
9- 20-तिरुवनंतपुरम: कॉमरेड एस- मिनी
12- मध्य प्रदेश:
1- 3-ग्वालियर: कॉमरेड सुनील गोपाल
2- 4-गुना: कॉमरेड मनीष श्रीवास्तव
3- 19-भोपाल: कॉमरेड जे- सी- बरई
13- महाराष्ट्र:
1- 9-रामटेक: कॉमरेड शैलेश जनबंधु
14- ओडिशा:
1- 2-सुंदरगढ़: कॉमरेड जस्टिन लुगुन
2- 3-संबलपुर: कॉमरेड नबकिशोर प्रधान
3- 7-भद्रक: कॉमरेड कीर्तन मल्लिक
4- 8-जाजपुर: कॉमरेड सुभाष मल्लिक
5- 9-ढेंकानाल: कॉमरेड मानसी स्वैन
6- 10-बोलांगीर: कॉमरेड हृदयानंद करुण
7- 14-कटक: कॉमरेड राजकिशोर मल्लिक
8- 20-बेरहामपुर: कॉमरेड सोमनाथ बेहरा
15- पुदुचेरी:
1- 1-पान्डिचेरी: कॉमरेड मुटु
16- पंजाब:
1- 11-भटिंडा: कॉमरेड स्वर्ण सिंह
17- राजस्थान:
1- जयपुर: कॉमरेड कुलदीप सिंह
18- तमिलनाडु:
2- चेन्नई नॉर्थ: कॉमरेड जे- सेबस्टिन
2- 3-चेन्नई साउथ: कॉमरेड एस- साईकुमार
3- 33-थेनी: कॉमरेड टी- चिन्नासाथियामूर्ति
4- 23-सलेम: कॉमरेड पी- मोहन
19- तेलंगाना:
1- 8-सिकंदराबाद: कॉमरेड सीएच प्रमिला
2- 6-मेडक: कॉमरेड के- भारतेश
20- त्रिपुरा:
1- 1-त्रिपुरा पश्चिम: कॉमरेड अरुण कुमार भौमिक
21- उत्तर प्रदेश:
1- 6-मुरादाबाद: कॉमरेड विजयपाल सिंह
2- 39-प्रतापगढ़: कॉमरेड शेषनाथ तिवारी
3- 70-घोसी: कॉमरेड सुरजीत लाल श्रीवास्तव
4- 72-जौनपुर: कॉमरेड अशोक कुमार ऽरवार
22- उत्तराखंड:
1- 1-टिहरी गढ़वाल: कॉमरेड मुकेश सेमवाल
23- पश्चिम बंगाल:
1- 1-कूचबिहार: कॉमरेड प्रभात रॉय
2- 2-अलीपुरद्वार: कॉमरेड रवि चंद्र राव
3- 3-जलपाईगुड़ी: कॉमरेड हरिभत्तफ़ सरदार
4- 4-दार्जिलिंग: कॉमरेड तन्मय दत्त
5- 5-रायगंज: कॉमरेड सुश्रुत पाल
6- 6-बालुरघाट: कॉमरेड नुरुल हक
7- 7-मालदा उत्तर: कॉमरेड सुभाष सरकार
8- 8-मालदा दक्षिण: कॉमरेड अंशुधर मंडल
9- 9-जंगीपुर: कॉमरेड समिरुद्दीन
10- 10-बहरामपुर: कॉमरेड अनिसुल अम्बिया
11- 11-मुर्शिदाबाद: कॉमरेड बकुल ऽांडकर
12- 12-कृष्णानगर: कॉमरेड ऽुदा बख्श
13- 13-राणाघाट: कॉमरेड परेश चंद्र हलदर
14- 14-बनगांव: कॉमरेड स्वपन मंडल
15- 15-बैरकपुर: कॉमरेड प्रदीप चौधरी
16- 16-दमदम: कॉमरेड तरुण दास
17- 17-बारासात: कॉमरेड तुषार घोष
18- 18-बशीरहाट: कॉमरेड अजय बैन
19- 19-जयनगर: कॉमरेड जयकृष्ण हलदर
20- 20-मथुरापुर: कॉमरेड पूर्ण चन्द्रा नैया
21- 21-डायमंड हार्बर: कॉमरेड अजय घोष
22- 22-जाधवपुर: कॉमरेड सुजाता बनर्जी
23- 23-कोलकाता दक्षिण: कॉमरेड देवब्रत बेरा
24- 24-कोलकाता उत्तर: कॉमरेड विज्ञान बेरा
25- 25-हावड़ा: कॉमरेड शहनवाज
26- 26-उलुबेरिया: कॉमरेड मिनती सरकार
27- 27-श्रीरामपुर: कॉमरेड प्रद्युत चौधरी
28- 28-हुगली: कॉमरेड भास्कर घोष
29- 29-आरामबाग: कॉमरेड प्रशांत माली
30- 30-तमलुक: कॉमरेड मधुसूदन बेरा
31- 31-कांथी: कॉमरेड मानस प्रधान
32- 32-घटाल: कॉमरेड दिनेश मेईकाप
33- 33-झाड़ग्राम: कॉमरेड सुशील मांडी
34- 34-मेदिनीपुर: कॉमरेड तुषार जाना
35- 35-पुरुलिया: कॉमरेड रंगलाल कुमार
36- 36-बांकुरा: कॉमरेड तन्मय मंडल
37- 37-बिष्णुपुर: कॉमरेड अजीत बाउरी
38- 38-बर्दवान पूर्व: कॉमरेड निर्मल मांझी
39- 39-बर्दवान-दुर्गापुर: कॉमरेड सुचेता कुंडू
40- 40-आसनसोल: कॉमरेड अमर चौधरी
41- 41-बोलपुर: कॉमरेड विजय दलुई
42- 42-बीरभूम: कॉमरेड आएशा खातून
 
विधानसभा चुनाव, 2019
निर्वाचन क्षेत्र और उम्मीदवारों का नाम
1- ओडिशा:
1- 13-राजगांगपुर: कॉमरेड लियोनी टिके
2- 22-आनंदपुर: कॉमरेड अनाम चरण मुऽी
3- 23-पटना: कॉमरेड बेनुधर सरदार
4- 26-जोशीपुर: कॉमरेड संभुनाथ नाइक
5- 29-बंग्रीपोशी: कॉमरेड पीताम्बर नाइक
6- 30-करंजिया: कॉमरेड बाजुराम सिद्दू
7- 43-भंडारीपोखरी: कॉमरेड दिगंबर स्वैन
8- 48-बिंझारपुर: कॉमरेड राधा बल्लभ मल्लिक
9- 51-धर्मशाला: कॉमरेड मधुमिता साहू
10- 59-पल्लहारा: कॉमरेड निर्मला प्रधान
11- 60-तालचर: कॉमरेड प्रल्हाद साहू
12- 61-अंगुल: कॉमरेड मंदोदरी राउत
13- 62-चेंडीपारा: कॉमरेड भरत कुमार नाइक
14- 63-अथमलिक: कॉमरेड रमणी रंजन प्रधान
15- 64-बिरमहाराजपुर: कॉमरेड नित्यानंद मल्लिक
16- 88-बांकी: कॉमरेड अरविंद बेहरा
17- 90-बारबटी कटक: कॉमरेड प्रताप चंद्र मिश्रा
18- 91-चौडवार कटक: कॉमरेड पावेल प्रियदर्शन
19- 93-कटक सदर: कॉमरेड सस्मिता मोहंती
20- 110-पिपिली: कॉमरेड पप्र चरण जेना
21- 131-हिंजिली: कॉमरेड डी- तिरुपति डोरा
22- 132-गोपालपुर: कॉमरेड पी- सिबप्रसाद रेड्डी
23- 133-बेरहामपुर: कॉमरेड शिबानी शंकर मिश्रा
24- 144-कोरापुट: कॉमरेड रामचंद्र बारिक
2- आंध्र प्रदेश:
1- 94-गुंटूर पश्चिम: कॉमरेड एम- बसवाराजू
2- 153-अनंतपुर: कॉमरेड डी- राघवन
3- 157-हिंदूपुर: कॉमरेड अशोक

सोशलिस्ट यूनिटी सेण्टर ऑफ इण्डिया (कम्युनिस्ट)
संसद चुनाव, 2019
राज्य / संघ राज्य क्षेत्र का नाम और निर्वाचन क्षेत्रें की संख्या

1- असम: 6
2- आंध्र प्रदेश: 2
3- अंडमान-निकोबोर द्वीप समूह: 1
4- बिहार: 8
5- छत्तीसगढ़: 3
6- दिल्ली: 2
7- गुजरात: 2
8- हरियाणा: 4
9- झारखंड: 5
10- कर्नाटक: 8
11- केरल: 9
12- मध्य प्रदेश: 3
13- महाराष्ट्र: 1
14- ओडिशा: 8
15- पुदुचेरी: 1
16- पंजाब: 1
17- राजस्थान: 1
18- तमिलनाडु: 4
19- तेलंगाना: 2
20- त्रिपुरा: 1
21- उत्तर प्रदेश: 4
22- उत्तराखंड: 1
23- पश्चिम बंगाल: 42
कुल संसद निर्वाचन क्षेत्र: 119
 
विधानसभा चुनाव, 2019
राज्य का नाम और निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या

1- ओडिशा: 24
2- आंध्र प्रदेश: 03
विधानसभा की कुल संख्या: 27

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